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प्रेमचंद साहित्य / कहानियां Premchand Stories / Kahaniyan

Comments

  1. कथा साहित्य के शास्त्रीय लेखक के रूप में स्थापित प्रेमचंद की कहानियाँ आज भी प्रसांगिक हैं |

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  2. हिंदि कहानी और उपन्यास साहित्य के केवल एक मात्र आधार संतभ प्रेमचंद हैं । यदि प्रेमचंद न होते तो साहित्य का विकास न होता ।

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  3. Premchand Hindi sahitya ke pita hai

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  4. Premchand Hindi sahitya ke pita hai

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गम्मत / सत्यनारायण पटेल

होह... होह... होह...

कुर्रर्रर्र... कुर्रर्रर्र... कुर्रर्रर्र...

सी एम फलाने सिंह जी के काफिले के आगे सड़क पर वार्नर जीप बेखटके दौड़ रही है। जीप में हवा बेधड़क और जरूरत से ज्यादा आ रही है। गई रात, आधी रात के बाद हुई झमाझम बरसात का पानी पीकर हवा के नाखून उग आए हैं - ठंडे और पैने नाखून। हवा की चाल में गजब की तेजी है। जीप के हुड का कपड़ा फड़फड़ा रहा है। सोमू भील जीप चला रहा है, उसकी बगल में सहायक उपनिरीक्षक एम.के. डामोर और पीछे की सीट पर बंसी बैठा है। सभी ने गरम कपड़े पहने हैं। ठंड के मारे सोमू भील और डामोर के मुँह के जबड़े थ्रेसर के छलने की तरह हिल रहे हैं। ऊपर-नीचे के दाँत आपस में टकरा रहे हैं। डामोर को ठंड से बचाव का एक रास्ता सूझता है - आपस में बात करते रहना। इसलिए वह किस्से सुनाने लगता है। सोमू उसके किस्से सुनता है। हाँ...हूँ... कर हुंकारे भी भरता है। पर बंसी जाने किस लोक में खोया है, उसे न डामोर की आवाज सुनाई दे रही है, न ठंड लग रही है, बल्कि उसकी कनपटियों से पसीने के रेले ढुलक रहे हैं - खारे और पारदर्शी रेले।

बंसी को देखने से तो यही लगता है कि वह जीप में पिछली सीट पर बैठा है और …

कबीर की रचनाएँ /दोहावली पृष्ठ 8

परिचय
मूल नाम : कबीरा, कबीर साहब

जन्म : 1398 लहरतारा ताल, काशी (उत्तर प्रदेश)
भाषा : हिंदी अवधी, सधुक्कड़ी, पंचमेल खिचड़ी
विधाएँ : कविता
मुख्य कृतियाँ
साखी, सबद और रमैनी

निधन
1518, मगहर, उत्तर प्रदेश

विशेष
संत कबीर दास हिंदीसाहित्य के भक्ति काल के इकलौते ऐसे कवि   जो आजीवन समाज और लोगों के बीच व्याप्त आडंबरों पर कुठाराघात करते रहे। वह कर्म प्रधान समाज के पैरोकार थे और इसकी झलक उनकी रचनाओं में साफ झलकती है। लोक कल्याण हेतु ही मानो उनका समस्त जीवन था। कबीर को वास्तव में एक सच्चे विश्व - प्रेमी का अनुभव था। कबीर की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उनकी प्रतिभा में अबाध गति और अदम्य प्रखरता। समाज में कबीर को जागरण युग का अग्रदूत कहा जाता है।
डॉ. हज़ारी प्रसाद द्विवेदी ने लिखा है कि साधना के क्षेत्र में वे युग - युग के गुरु थे, उन्होंने संत काव्य का पथ प्रदर्शन कर साहित्य क्षेत्र में नव निर्माण किया था।





सेवक सेवा में रहै, सेवक कहिये सोय । 
कहैं कबीर सेवा बिना, सेवक कभी न होय ॥ 701 ॥ 

अनराते सुख सोवना, राते नींद न आय । 
यों जल छूटी माछरी, तलफत रैन बिहाय ॥ 702 ॥ 

यह मन ताको दीजिये, साँचा सेवक होय । 
सि…

लुगड़ी का सपना / सत्यनारायण पटेल

फूँऊँ.ऽ..ऽ..ऽ..ऽ..ऽ..ऽ..ऽ.............

यह शंख की ध्वनि थी- न सिर्फ़ मन्दिर से डूँगा के कान तक बल्कि गाँव के कोने-कुचाले तक पसरी और लम्बी। गन्धहीन और अदृश्य। ध्वनि भी क्या! बस, शंख के पिछवाड़े़ में फूँकी एक लम्बी फूँक, जो शंख के मुँह से ऊँचा स्वर लिए, तेज़ी से बाहर निकली थी, और डूँगा के कान तक आते-आते हवा में घुली धीमी और महीन ध्वनि में बदल गई थी। थी हवा से भी हल्की, पर जब कान से मग़ज़ तक में पसरी और फिर ख़ून में घुल गई तो डूँगा उठकर खड़ा हो गया। असल में वह डूँगा और उसके सरीखे उन सबके लिए एक हाँक, एक बुलावा और एक संकेत था, या हवा का ऐसा हाथ, जो दिखता नहीं, बस, हर रात आठ बजे के दरमियान कान पकड़कर मन्दिर में होने वाली आरती में खींच ले जाता।

डूँगा मन्दिर में होने वाली आरती में जाता तो था पर उसे न भगवान पर कोई भरोसा था, न आरती गाने का शौक। फिर भी वह आरती में जाता, क्योंकि वहाँ ढपली, करताल, खँजड़ी और झाँझ होती, और डूंगा झाँझ, करताल, ढपली और खँजड़ी बजाने का शौकीन था, इनमें से जो भी हाथ लग जाता, उसे इतनी तनमयता से बजाता कि आरती में आए लोग देखते ही रह जाते। सोचते कि डूँगा आरती में, भक्ति में …